जितने दर दर की ठोकरें खानी हैं खा लो मगर जो मिलेगा बाप का ही मिलेगा क्योंकि बाप अपनी वसीयत बेटे के नाम ही लिख कर जाता है
इसलिए 10 जगह ठोकरें खाने से अच्छा अपना एक ही आत्मिक/रूहानी रूपी बाप का हाथ पकड़ लो और पकड़ने में शंका नही आनी चाहिए क्योंकि सुख दुख तो जिंदगी में आते जाते ही रहंगे मौसम की तरह "एक पिता एकस के हम बारिक"ऐसे ही रूहानी विचार रोजाना सुनने के लिए, नीचे अपनी E- Mail डालकर, वेबसाइट को सब्सक्राइब कर लीजिए ताकि हर नई पोस्ट की नोटिफिकेशन आप तक पहुंच सके ।
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